Wednesday, June 12, 2013
Thursday, May 30, 2013
Kumud Pandey: Few lines which I really loved..:)
Kumud Pandey: Few lines which I really loved..:): "Kabhi khud ko kisi betaqalluf ki nigah se bhi dekhiye... Rishton ke mulahije toh sarahte hain aapko roz hee..."
कभी खुद को किसी बेतक़ल्लुफ़ की निगाह से भी देखिये
रिश्तों के मुलाहिजे तो सराहते हैं रोज़ ही आपको
कभी खुद को किसी बेतक़ल्लुफ़ की निगाह से भी देखिये
रिश्तों के मुलाहिजे तो सराहते हैं रोज़ ही आपको
Friday, March 8, 2013
मनाओ…”महिला दिवस पर”
मना सकते हो तो उस रूठी हुई रूह को मनाओ
और वो एक ही क्या, कितनी और जो रूठ चली गयीं
चलीं क्या गयीं...बे आबरू और रुसवा की गयीं
जीते जी रूठना-मनाना तो फिर भी खूबसूरत था
पर जिस तरह से काले दिन मने वो बदसूरत था
हाँ, उम्मीद पर ही आदम की ये हयात कायम है
तो चलो आज के दिन कर लेते हैं एक और उम्मीद
सिर्फ जागना ही काफी नहीं टूटे होश की बेहोश नींद
उन बेहोशों का तो कोई भी यकीन नहीं न आज न कल
ये सोच विचार की बातें हैं हमारे लिए जो रखते अक्ल
ज़ाया ही कर देंगे इस दिन को भी हम गुज़रते ही
चली जो गयी भैंस अक्ल का सूखा चारा चरते ही
चलो देखो जितना हो सके उतनों तक ये दिन पहुँचाओ
मना सकते हो तो उस रूठी हुई रूह को मनाओ!!!
"असंख्य निर्भायाओं" के आह्वान के साथ नमन, हर उस महिला का जो पुरुषों को उनके अस्तित्व का मौक़ा देती है इंसानों की इस दुनिया में.
और वो एक ही क्या, कितनी और जो रूठ चली गयीं
चलीं क्या गयीं...बे आबरू और रुसवा की गयीं
जीते जी रूठना-मनाना तो फिर भी खूबसूरत था
पर जिस तरह से काले दिन मने वो बदसूरत था
हाँ, उम्मीद पर ही आदम की ये हयात कायम है
तो चलो आज के दिन कर लेते हैं एक और उम्मीद
सिर्फ जागना ही काफी नहीं टूटे होश की बेहोश नींद
उन बेहोशों का तो कोई भी यकीन नहीं न आज न कल
ये सोच विचार की बातें हैं हमारे लिए जो रखते अक्ल
ज़ाया ही कर देंगे इस दिन को भी हम गुज़रते ही
चली जो गयी भैंस अक्ल का सूखा चारा चरते ही
चलो देखो जितना हो सके उतनों तक ये दिन पहुँचाओ
मना सकते हो तो उस रूठी हुई रूह को मनाओ!!!
"असंख्य निर्भायाओं" के आह्वान के साथ नमन, हर उस महिला का जो पुरुषों को उनके अस्तित्व का मौक़ा देती है इंसानों की इस दुनिया में.
Wednesday, June 16, 2010
Friday, May 28, 2010
५ का गणित
आँखें देखती रहती हैं...ज़बान चखती रहती है...कान सुनते रहते हैं...नाक सूंघती रहती है...खाल महसूस करती है...इन पांचो इन्द्रियों से हम पल पल काम लेते हैं। दिल जानता है, दिमाग छानता है...पर गर्द का ढेर हर दिन इतना जमा होता है कि दिमाग़ सांस नहीं ले पाता और इतना मसरूफ़ हो जाता है कि उसके पास अगर कुछ रह जाता है तो वो होती है बस एक उलझन।
Wednesday, August 12, 2009
कमीने....स्वाईं फ्लू!
नमस्कार आप सभी को...गर्दन घुमा के आजू-बाजू देखा...अरे यहाँ तो कोई भीड़ नहीं! होगी भी कैसे? भीड़ तो वहां ही होती है जहाँ या तो फ़जीहत का मजमा लगा हो या मशहूरी का बाज़ार जमा हो। पर अपने पास तो फिलहाल दोनों ही सूरतें नहीं। बस गुनगुने पानी की तरह बीच में बैठे हैं...
बहरहाल, चलिए कुछ मौजूदा हाल की बात कर लेते हैं। हवा में इस वक़्त जो महामारी डंक मार रही है उससे हर तरफ़ खौफ़ और हवाइयां फैली हुई है। जिससे देखो वही बड़ा जिम्मेदार और फिक्रमंद नज़र आता है, मुंह पे सफ़ेद, हर, पीला जिसको जैसा मिला हिजाब सा पहने हुए है। स्वाइन फ्लू बड़ी जानलेवा मालूम पड़ रही है...प्रदूषण का काल भैरव ही क्या कम था की अब हर इंसान को साँस बाँध के जीना पड़े...जहाँ से भी चल पड़ी है ये बदहवा अब तो इससे बचना भी लाज़मी है और इससे निज्जात पाना भी। हम ख़ुद बड़ी एहतियात बारात रहे हैं, सर्दी-खांसी हम पे जल्द आती है और शायद पिछले २-३ दिन से हम पे कुछ ज़्यादा ही सवार है। ऑफिस में जहाँ ३-४ धौंकेसुनाई दिए खांसी के, लोगों की सलाहियत शुरू हो जाती है। टेस्ट करवा ले भाई, प्रेवेंशन इज बेटर देन क्योर...
दूसरी तरफ़ एक और हवा अब शुरू हो गई है...विशाल भरद्वाज की फ़िल्म कमीने की तर्ज़ पे अब लोग स्वाइन फ्लू को फ्वाइन फ्लू भी कहने लगे हैं। हमें भी बड़ा क्रेज हो रहा है इसे देखने का..सो हमने तो बुक भी करवा लिया। आज़ादी के दिन दुआ करेंगे की जल्द ही महामारी से आजाद हो जाए हमारे देश हमारे वतन की आबो-हवा। और इत्मीनान से देखने के बाद यही कहेंगे...की कमीनेअब जुर्रत मत करना यहाँ फटकने की, वरना हम भी तैय्यारी करके रखेंगे तुझे मुंह के बल पटकने की॥
दोस्तों...बे सर पैर तो नहीं लिखना चाहा है यहाँ..पर बे सर पैर लहजे में ज़रूर लिखा है। इस बार आया हूँ तो यह पक्का करना चाहता हूँ की चाहे फ़जीहत का मजमा जी पहले क्यों न लगे...लिखने की जुर्रत करना नहीं छोडूंगा ।
चलिए इसी बात पे विदा लेता हूँ। खैरियत से रहिये, फ्वाइन म म मेरा मतलब है स्वाईं से बचिए और औरों को भी बचाइये..और दिल निचोड़ना हो तोहकमीने देखतेआइये!
फिर मिलेंगे!
बहरहाल, चलिए कुछ मौजूदा हाल की बात कर लेते हैं। हवा में इस वक़्त जो महामारी डंक मार रही है उससे हर तरफ़ खौफ़ और हवाइयां फैली हुई है। जिससे देखो वही बड़ा जिम्मेदार और फिक्रमंद नज़र आता है, मुंह पे सफ़ेद, हर, पीला जिसको जैसा मिला हिजाब सा पहने हुए है। स्वाइन फ्लू बड़ी जानलेवा मालूम पड़ रही है...प्रदूषण का काल भैरव ही क्या कम था की अब हर इंसान को साँस बाँध के जीना पड़े...जहाँ से भी चल पड़ी है ये बदहवा अब तो इससे बचना भी लाज़मी है और इससे निज्जात पाना भी। हम ख़ुद बड़ी एहतियात बारात रहे हैं, सर्दी-खांसी हम पे जल्द आती है और शायद पिछले २-३ दिन से हम पे कुछ ज़्यादा ही सवार है। ऑफिस में जहाँ ३-४ धौंकेसुनाई दिए खांसी के, लोगों की सलाहियत शुरू हो जाती है। टेस्ट करवा ले भाई, प्रेवेंशन इज बेटर देन क्योर...
दूसरी तरफ़ एक और हवा अब शुरू हो गई है...विशाल भरद्वाज की फ़िल्म कमीने की तर्ज़ पे अब लोग स्वाइन फ्लू को फ्वाइन फ्लू भी कहने लगे हैं। हमें भी बड़ा क्रेज हो रहा है इसे देखने का..सो हमने तो बुक भी करवा लिया। आज़ादी के दिन दुआ करेंगे की जल्द ही महामारी से आजाद हो जाए हमारे देश हमारे वतन की आबो-हवा। और इत्मीनान से देखने के बाद यही कहेंगे...की कमीनेअब जुर्रत मत करना यहाँ फटकने की, वरना हम भी तैय्यारी करके रखेंगे तुझे मुंह के बल पटकने की॥
दोस्तों...बे सर पैर तो नहीं लिखना चाहा है यहाँ..पर बे सर पैर लहजे में ज़रूर लिखा है। इस बार आया हूँ तो यह पक्का करना चाहता हूँ की चाहे फ़जीहत का मजमा जी पहले क्यों न लगे...लिखने की जुर्रत करना नहीं छोडूंगा ।
चलिए इसी बात पे विदा लेता हूँ। खैरियत से रहिये, फ्वाइन म म मेरा मतलब है स्वाईं से बचिए और औरों को भी बचाइये..और दिल निचोड़ना हो तोहकमीने देखतेआइये!
फिर मिलेंगे!
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